भगवद गीता: अध्याय 4, श्लोक 8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।4.8।।

paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśhāya cha duṣhkṛitām dharma-sansthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge

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Word Meanings

paritrāṇāya—to protect
sādhūnām—the righteous
vināśhāya—to annihilate
cha—and
duṣhkṛitām—the wicked
dharma—the eternal religion
sansthāpana-arthāya—to reestablish
sambhavāmi—I appear
yuge yuge—age after age
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अनुवाद

।।4.8।। साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।

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टीका

4.8।। व्याख्या--'परित्राणाय साधूनाम्'--साधु मनुष्योंके द्वारा ही अधर्मका नाश और धर्मका प्रचार होता है, इसलिये उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।दूसरोंका हित करना ही जिनका स्वभाव है और जो भगवान्के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, लीला आदिका श्रद्धा-प्रेमपूर्वक स्मरण, कीर्तन आदि करते हैं और लोगोंमें भी इसका प्रचार करते हैं, ऐसे भगवान्के आश्रित भक्तोंके लिये यहाँ 'साधूनाम्' पद आया है। जिसका एकमात्र

परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य है, वह साधु है (टिप्पणी प0 223) और जिसका नाशवान् संसारका उद्देश्य है, वह असाधु है।असत् और परिवर्तनशील वस्तुमें सद्भाव करने और उसे महत्त्व देनेसे कामनाएँ पैदा होती है। ज्यों-ज्यों कामनाएँ नष्ट होती हैं, त्यों-त्यों साधुता आती है और ज्यों-ज्यों कामनाएँ बढ़ती हैं, त्यों-त्यों साधुता लुप्त होती है। कारण कि असाधुताका मूल हेतु कामना ही है। साधुतासे अपना उद्धार और लोगोंका स्वतः उपकार होता है।साधु पुरुषके भावों और क्रियाओँमें पशु, पक्षी, वृक्ष, पर्वत, मनुष्य, देवता, पितर, ऋषि, मुनि आदि सबका हित भरा रहता है--