भगवद गीता: अध्याय 4, श्लोक 3

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।4.3।।

sa evāyaṁ mayā te ’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ bhakto ’si me sakhā cheti rahasyaṁ hyetad uttamam

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Word Meanings

saḥ—that
eva—certainly
ayam—this
mayā—by me
te—unto you
adya—today
yogaḥ—the science of Yog
proktaḥ—reveal
purātanaḥ—ancient
bhaktaḥ—devotee
asi—you are
me—my
sakhā—friend
cha—and
iti—therefore
rahasyam—secret
hi—certainly
etat—this
uttamam—supreme
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अनुवाद

।।4.3।। तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है; क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है।

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टीका

4.3।। व्याख्या-- 'भक्तोऽसि मे सखा चेति' अर्जुन भगवान्को अपना प्रिय सखा पहलेसे ही मानते थे (गीता 11। 41 42), पर भक्त अभी (गीता 2। 7 में) हुए हैं अर्थात् अर्जुन सखा भक्त तो पुराने हैं, पर दास्य भक्त नये हैं। आदेश या उपदेश दास अथवा शिष्यको ही दिया जाता है, सखाको नहीं। अर्जुन जब भगवान्के शरण हुए, तभी भगवान्का उपदेश आरम्भ हुआ।जो बात सखासे भी नहीं कही जाती, वह बात भी शरणागत शिष्यके सामने प्रकट कर दी जाती

है। अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि 'मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए, मुझको शिक्षा दीजिये।' इसलिये भगवान् अर्जुनके सामने अपनेआपको प्रकट कर देते हैं, रहस्यको खोल देते हैं। अर्जुनका भगवान्के प्रति बहुत विशेष भाव था, तभी तो उन्होंने वैभव और अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित 'नारायणी सेना' का त्याग करके निःशस्त्र भगवान्को अपने 'सारथि' के रूपमें स्वीकार किया (टिप्पणी प0 211)।साधारण लोग भगवान्की दी हुई वस्तुओंको

तो अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं), पर भगवान्को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने हैं)। वे लोग वैभवशाली भगवान्को न देखकर उनके वैभवको ही देखते हैं। वैभवको ही सच्चा माननेसे उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान्का अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान्की तरफ उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। कुछ लोग वैभवकी प्राप्तिके लिये ही भगवान्का भजन करते हैं। भगवान्को चाहनेसे तो वैभव भी पीछे आ जाता है, पर वैभवको

चाहनेसे भगवान् नहीं आ सकते। वैभव तो भक्तके चरणोंमें लोटता है; परन्तु सच्चे भक्त वैभवकी प्राप्तिके लिये भगवान्का भजन नहीं करते। वे वैभवको नहीं चाहते, अपितु भगवान्को ही चाहते हैं। वैभवको चाहनेवाले मनुष्य वैभवके भक्त (दास) होते हैं और भगवान्को चाहनेवाले मनुष्य भगवान्के भक्त होते हैं। अर्जुनने वैभव-(नारायणी सेना-) का त्याग करके केवल भगवान्को अपनाया, तो युद्धक्षेत्रमें भीष्म, द्रोण, युधिष्ठिर आदि महापुरुषोंके रहते हुए भी गीताका महान् दिव्य उपदेश केवल अर्जुनको ही प्राप्त हुआ और बादमें राज्य भी अर्जुनको मिल गया!